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Thursday, 2 February 2012

अंगड़ाई

अलसा लो, सुस्ता लो,
आज एक अंगड़ाई लो ऐसी
कि वो थकान जो तुम्हारी माथे की रेखाओं
में आकर बैठ गयी है
फुर्र से उड़ जाए,
धूप ढल जाए,
ज्यों ही तुम बंद करो आँखें |
मुस्कुरा दो फिर हलके से
कि छोटी छोटी सी हो जाएँ आँखे,
फूल सा खिल जाए चेहरा
और तुम्हारे करीब होने की खुशबू
कुछ साँसों में घुलती रहे मेरी
और कुछ तुम्हारी साँसों की सरगम
मेरे कानो में पड़ती रहे |
चांदनी के फूल अब टूटकर
रात से गिरना चाहते हैं,
अपनी आखों के जुगनुओं से
शाम को परेशाँ न करो
सो जाओ, कि दिन थक गया है |

Saturday, 17 December 2011

Kitaab














वो किताब
इक रात जिसे पढ़ते पढ़ते तुम सो गए थे
मुँह के बल पड़ी रही रात भर
और सुबह ऐसे ही
उसी पन्ने पर उसे टेबल पे लिटाकर
निकल पड़े थे तुम
दुनियादारी के लिए |

फिर तुम काम की बातों में
ऐसा उलझे
की उसको देखा तो रोज़
पर पढ़ पाने का वक़्त न निकाल पाए |

आज-कल तुम्हे तुम्हारी थकान ही सुला दिया करती है,
और दिल बहलाने के लिए,
खुद में ही उलझ लेते लेते हो तुम |

मैं वही किताब हूँ
जो मेज़ पर उलटी हुई
धूल की परतों के बीच
कुछ रोज़ के सामान के साथ
पड़ी हुई है |

Thursday, 15 December 2011

कला

आओ मेरे टुकड़े कर दो,
छोटे छोटे टुकड़े,
कतरा कतरा आँसू जैसे बिखेर दो,
टुकड़ों के सूख जाने के बाद
समेट लेना तुम ही
और अपने हिसाब से,
जोड़ लेना उन्हें
अपने नियमों से |

रंग लेकर गालों में लाली भर देना,
और होठों पर मुस्कान खींच देना,
ये खिलौना मज़बूत होगा
टूटेगा नहीं,
और टूट भी गया तो
चूर चूर होकर भी,
रोयेगा नहीं |

फिर नाज़ करना अपने ऊपर,
की तुमने इंसानों को
बुत बनाने की कला
सीख ली है |

*सेंट्रल पार्क की एक शाम *

आस्मां के नीले दरिया पर
हल्की-हल्की लहरें उठ रही हैं,
और बादलों का सफ़ेद झाग
बह कर धरती तक आ रहा है,|
गीली हल्दी गिरा दी उसपर
किसी के हाथों ने,
मेहँदी रचा ली शाम ने,
दूल्हा बनकर चाँद उसे लेने जो आयेगा  |

ज़मीन थक गयी,
थक गए लोग- कुछ शरीर;
कुछ उमीदों का बोझ ढोते हुए,
दुनियादारी और गृहस्थी के बीच
अल्पविराम लगाने को
आये हैं यहाँ |

लोग ही लोग,
नीले, पीले, काले, गुलाबी लोग;
हँसते खिलखिलाते गाते बजाते लोग,
एक दुसरे से  प्रेम दिखाते लोग,
कुछ लड़ते कुछ झुन्झुलाते लोग|

एक लड़की गुलाब के  एक फूल से खेलती हुई,
एक लड़का गिटार बजाता हुआ,
एक शरमाई हुई प्रेमिका |

कुछ बच्चे,
नंगे पैर खेल रहे हैं |
मौसम हल्का सा सर्द है,
ये बचपन की ऊर्जा है शायद,
कि सर्द हवाए गर्म हो जाती हैं,
और पत्थर की सख्त ज़मीन भी
कपास जैसी नर्म हो जाती है |
कपास से ही कोमल है बच्चों क सपने भी,
और कपास से कोमल भी है ये शाम भी |

शाम धीरे धीरे रात को समर्पित हो जाएगी,
सोचती होगी शायद वो भी कभी एकाकीपन में,
कि छोटी सी क्यूँ उम्र है मेरी,
ये किलकारियां क्यूँ नहीं गूँज सकती कुछ देर और,
कुछ देर और क्यूँ नहीं चल सकता ये लोगों का मेला |

गुलाब की लाली और गिटार की आवाज धीमी पड़ने लगी है,
परदे गिरने लगे अब कालिमा के,
आज की पेशकश,
अब खत्म होती है |

The fallen leaf-on Dravid's retirement from the ODIs

Today time prostrates in front of you,
The wind dances on your tunes
is your bat, an instrument,
or a magic wand, which freezes time?

they have technical terms
for shots you play
aint what you play,a poem?
which dissolves in the eyes,
n flow to the heart.

are you a player,
or a book,
whose pages when i turn,
my childhood returns.

is your game today,
my re-incarnated past?
bringing back my sleepy eyes,
which opend at 5 am to see you bat?

Are you THE WALL of my lost dreams
which lay somewhere, frozen in the past?
Are you, my first explanation of romance,
when i didnt even know what falling in love is?

yes,
you are,
such a chapter of my life, which shall not end.

Here i catch, the fallen leaf of time.